महिला मस्जिद में कुत्ता लेकर चली गयी थी, अब आया फैसला

नेहा श्रीवास्तव, इंदौर। हम इक्कीसवीं सदी में जी तो रहे हैं लेकिन हमारे अंदर एक्सेप्टेंस की क्षमता काफ़ी कम है। हमने अपने आप को एक खांचे में फिट कर लिया है तथा उससे बाहर जब भी कुछ सोचते हैं तो तुरंत अनकम्फर्टेबल फ़ील करने लगते हैं। एक और दिक्कत हमारे साथ ये है कि हम इस पर बात करने से भी कतराते हैं।

दरअसल पिछले साल जुलाई में सुज़ेथ मार्ग्रेट नाम की इस महिला का वीडियो वायरल हो गया था जिसमें वो जूते पहनकर अपने कुत्ते के साथ मस्जिद में दाखिल होते हुए दिख रही थीं। इंडोनेशिया में कुत्ता लेकर मस्जिद जाने वाली महिला को कोर्ट ने मानसिक बीमारी के आधार पर जेल भेजने से इनकार कर दिया है।

मुस्लिम बहुल इंडोनेशिया में लोग इस घटना को लेकर नाराज़ हो गए थे क्योंकि देश का एक बड़ा तबका कुत्ते को अपवित्र जानवर समझता है। जकार्ता के पास बोगोर शहर की अदालत ने बुधवार को इस महिला को ईशनिंदा के आरोप में दोषी तो करार दिया लेकिन ये भी कहा कि उन्हें उनकी हरकतों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

सुज़ेथ मार्ग्रेट साल 2013 से ही सिज़ोफ्रेनिया की मरीज़ थीं। हालांकि अभियोजन पक्ष ने उन्हें आठ महीने के लिए जेल की सज़ा दिए जाने की मांग की थी। जुलाई में वायरल हुए इस वीडियो में बोगोर की एक मस्जिद में एक महिला दाख़िल होने के बाद ये कहती दिख रही है कि वो एक कैथोलिक हैं। महिला कह रही थी कि उनके पति मस्जिद में उस दिन शादी करने वाले थे. महिला वीडियो में साफ़ तौर पर अवसाद ग्रस्त दिख रही थीं।

महिला ने मस्जिद पर अपने पति का धर्मांतरण करने का आरोप लगाया तभी उनका कुत्ता दौड़कर उनके पास आ गया। मस्जिद में मौजूद लोगों का कहना था कि उन्हें उस कथित शादी के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। जब मस्जिद के एक स्टाफ़ ने महिला को वहां से जाने के लिए कहा तो महिला ने उन्हें लात से मारा। कहा जा रहा है कि इस घटना के बाद एक गाड़ी की चपेट में आने से कुत्ते की मौत हो गई थी।

क्या है ये सिजोफ्रेनिया

अब आते हैं मेंटल हेल्थ पर आज भी मेंटल हेल्थ पर बहुत ध्यान नहीं दिया जाता है। इस संबंध में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) का मानना है कि देश में मानसिक रोगों को अभी भी उचित महत्व नहीं दिया जा रहा। अभी भी लोगों को इसके लिए जागरूक होने की जरूरत है। ऐसा ही एक मानसिक विकार जिसे सिजोफ्रेनिया के नाम से जाना जाता है।

सिजोफ्रेनिया जो एक पुराना और गंभीर मानसिक विकार है और जिसकी वजह से व्यक्ति के सोचने, महसूस करने और व्यवहार करने का तरीका प्रभावित होता है। सिजोफ्रेनिया 16 से 30 साल की आयु में हो सकता है। पुरुषों में इस रोग के लक्षण महिलाओं की तुलना में कम उम्र में दिखने शुरू हो सकते हैं। बहुत से लोगों को इस बात का अहसास ही नहीं होता कि उन्हें यह रोग हो गया है, क्योंकि इसके लक्षण बहुत लंबे समय बाद सामने आते हैं।

क्या कहते हैं आंकड़े

देशभर में किए गए एक सर्वे के अनुसार, भारत की सामान्य जनसंख्या का लगभग 13.7 प्रतिशत हिस्सा मानसिक बीमारियों से ग्रस्त है। इसके अलावा, इनमें से लगभग 10.6 प्रतिशत लोगों को इमिडिएट मेडिकल केयर की आवश्यकता होती है।

ख़बर इनपुट-बीबीसी

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