केरल के अट्टुकल पोंगल से लेकर दोल जात्रा में महिलाओं का किरदार

नेहा श्रीवास्तव, इंदौर। आज के दिन पुरे भारत में होलिका दहन मनाया जाता है और होलिका दहन के अगले दिन यानी 10 मार्च को होली (धुलंडी) मनाई जाएगी। देश में विभिन्न जगहों पर होली मिलन समारोह का आयोजन किया गया है। होली का त्योहार पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है और कई जगहों से होली सेलिब्रेशन की मनमोहक तस्वीरें भी सामने आई हैं।

वहीं कोरोना वायरस के भय के बीच केरल से लेकर पश्चिम बंगाल तक में होली को अपने तरीके से मनाने को लेकर प्रसिद्ध ‘अट्टुकल पोंगल’ तथा ‘डोल महोत्सव’ में लोगों का मजमा नज़र आया।

केरल का अट्टुकल पोंगल

इस उत्सव को ‘महिलाओं के सबरीमला’ के तौर पर भी जाना जाता है। दुनिया में सबसे बड़े महिला समागम के रूप में प्रतिष्ठित इस उत्सव ने इससे पहले 2009 में सबसे बड़े धार्मिक आयोजन का गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था। इस दौरान 25 लाख महिलाओं ने इसमें हिस्सा लिया था।

अट्टुकल भगवती का यह मंदिर नगर के मध्य में स्थित है। मान्यता है कि तमिल महाकाव्य ‘सिलापाथीकारम’ की मुख्य पात्र कन्नकी का यहां अवतार हुआ था। परंपरा के अनुसार पोंगल अनुष्ठान का आयोजन यहां 10 दिन चलने वाले अट्टुकल पोंगल त्योहार के आखिरी दिन से एक दिन पहले होता है।

त्योहार के लिए भोग बनाती महिलाएं। फ़ोटो क्रेडिट- एएनआई

धार्मिक अनुष्ठान के तहत पूरे राज्य से हजारों महिलाएं राजधानी स्थित अट्टुकल भगवती मंदिर के प्रांगण और सड़क के दोनों ओर एकत्रित होती हैं और मिट्टी के बर्तन में पोंगल (चावल, गुड़़,नारियल से बना पकवान) बनाती हैं। केरल के स्वास्थ्य मंत्री शैलजा ने शुक्रवार को कहा कि जिन लोगों को घरों में ही अलग रखा गया है या जो लोग संक्रमित लोगों या स्थान के संपर्क में आए हैं या उनमें कोरोना वायरस का कोई भी लक्षण पाया गया है उन्हें पोंगल अनुष्ठान में हिस्सा लेने से बचना चाहिए।

पत्रकारों से उन्होंने कहा, ‘‘अगर लोगों को एकत्र होने से रोकेंगे तो भय का माहौल पैदा होगा जबकि अभी चिंता की कोई बात नहीं है।” केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोरोना वायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए एहतियातन भीड़ के नहीं जमा होने की सलाह दी है। केंद्र सरकार द्वारा बड़े समागम से बचने की सलाह के बीच राज्य सरकार के कर्मी सतर्क हैं। केरल में कोरोना वायरस से संक्रमित तीनों लोगों के ठीक होने के बाद राज्य सरकार राहत की सांस ले रही है।

बंगाल का दोल जात्रा (दोल उत्सव)

पश्चिम बंगाल में होली से एक दिन पहले यानी होलिका दहन पर दोल उत्सव (दोल जात्रा) का आयोजन किया जाता है। इस दिन पारंपरिक वेशभूषा में महिलाएं शंख बजाते हुए राधा-कृष्ण की पूजा करती हैं और प्रभात-फेरी का आयोजन करती हैं। इसमें गाजे-बाजे के साथ कीर्तन और गीत गाए जाते हैं। कोलकाता में होली से एक दिन पहले आयोजित दोल उत्सव में रवींद्रनाथ टैगोर के गानों पर नाचकर और एक-दूसरे को रंग लगाकर लोग इस उत्सव का आनंद उठाते नजर आए।

क्यों मनाया जाता है?

दोल शब्द का मतलब झूला होता है। झूले पर राधा-कृष्ण की मूर्ति रख कर महिलाएँ भक्ति गीत गाती हैं और उनकी पूजा करती है। इस दिन अबीर और रंगों से होली खेली जाती है। इस दोल यात्रा में चैतन्य महाप्रभु द्वारा रचित कृष्ण-भक्ति संगीत की प्रचुरता रहती है। प्राचीन काल में इस अवसर पर ज़मीदारों की हवेलियों के सिंहद्वार आम लोगों के लिए खोल दिये जाते थे। उन हवेलियों में राधा-कृष्ण के मंदिर में पूजा-अर्चना और भोज चलता रहता था।

शांतिनिकेतन का जिक्र किये बिना दोल जात्रा अधूरा है। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने वर्षों पहले वहाँ बसंत उत्सव की जो परंपरा शुरू की थी, वो आज भी जैसी की तैसी है। विश्वभारती विश्वविद्यालय परिसर में छात्र और छात्राएँ आज भी पारंपरिक तरीक़े से होली मनाती हैं। लड़कियाँ लाल किनारी वाली पीली साड़ी में होती हैं। और लड़के धोती और कुर्ता पहनते हैं।

दोल उत्सव में सांस्कृतिक नृत्य करती महिलाएं। फ़ोटो क्रेडिट- एएनआई

वहाँ इस आयोजन को देखने के लिए बंगाल ही नहीं, बल्कि देश के दूसरे हिस्सों और विदेशों तक से भी भारी भीड़ उमड़ती है। इस मौक़े पर एक जुलूस निकाल कर अबीर और रंग खेलते हुए विश्वविद्यालय परिसर की परिक्रमा की जाती है। इसमें अध्यापक भी शामिल होते हैं। रवीन्द्रनाथ की प्रतिमा के पास इस उत्सव का समापन होता है। इस अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किये जाते हैं। शांतिनिकेतन और कोलकाता-स्थित रवीन्द्रनाथ के पैतृक आवास, जादासांको में आयोजित होने वाला बसंत उत्सव बंगाल की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है।

वृन्दावन की विधवा होली

देश के तमाम मंदिरों ने जहां विधवा महिलाओं के प्रवेश पर भी अघोषित पाबंदी लगा रखी है, वहीं वृंदावन की यह विधवा महिलाएं मंदिरों में जाकर भगवान के साथ गुलाल खेलती हैं। बनारस से भी विधवाएं यहां होली खेलने पहुँचती हैं। महिलाओं की जिंदगी में यह रंग भरे हैं सुलभ इंटरनेशनल और उनके संस्थापक बिंदेश्वर पाठक ने।

होली मानतीं विधवा महिलाएं

देश भर में सुलभ शौचालय की श्रृंखला खड़ी करने वाला सुलभ इंटरनेशनल विधवाओं के जीवन में आया और इनकी ज़िन्दगी में रंग भर दिए। हर साल बिंदेश्वर पाठक इन विधवा महिलाओं के साथ मिलकर होली का त्यौहार मनाते हैं और उनको बताते हैं कि आपको भी रंगों में सराबोर होने का अधिकार है।

दो दशक पहले वृंदावन में कुछ भी ठीक नहीं था। देश भर से आने वाली विधवाओं के लिए एक भजनाश्रम ही जगह थी, जहां वे भजन गाकर मिलने वाले थोड़े से पारिश्रमिक में अपना जीवन बसर करती थीं। उनके जीवन में सफेद रंग के अलावा दूसरे रंग की कोई अहमियत नहीं थी। लगभग एक दशक पहले कुछ ऐसा हुआ, जिसने यहां की संवासिनियों के जीवन में रौनक लौटा दी। त्योहार इनके लिए अब बेरंग नहीं रहे। होली पर उनके जीवन में रंगों की बहार आती है और घर के आंगन में गुलाल बिखरता है। उनके उत्साह को देखकर ऐसा लगता है कि वे सदियों से चली आ रही अपनी बदरंग जिन्दगी को बहुत जल्दी भुला देना चाहती हो।

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