नमाज़ पढ़ने के लिए तेरी क़सम, जिंदा रहना भी जरूरी है सनम

हेमंत शर्मा

मुआफ़ी… बहुत मुआफ़ी! दिल की गहराइयों से। डॉक्टर्स से, प्रशासन से, पुलिस से और उन तमाम लोगों से, जो इस समय इंसानियत को बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं।

बिलकुल यही मजमून है, जो कल रात से अचानक बदला है। दावे, तर्क, काट और अस्त्र रख दिए गए हैं और उन ज़ाहिलों को समझाने की गंभीर कोशिश शुरू हुई है, जो सिर्फ आंखों पर पट्‌टी और दिमाग पर ताला डालकर अपने दड़बों में ऊपरवाले द्वारा तय की गई “स्टॉप वॉच’ की टिक-टिक सुनने के बाद भी तय नहीं कर पा रहे कि उनके पास समय कितना बचा है।
अरे ज़ाहिलों… नमाज़ पढ़ने के लिए भी तो जिंदा रहना जरुरी है।

तुमने सबसे ज़रुरी समय तो हिंदू-मुस्लिम करने में निकाल दिया। तुम मरकज़ में बैठे रहे (छुपे थे या फंसे थे, एक ही बात है) और बीमारी देते गए। जब सवाल किए तो पलटकर कहा- वैष्णोदेवी और शिर्डी में भी तो लोग थे। वे फंसे और हम छुपे? हां, दोनों में अंतर था। 400 से ज्यादा अंकों का अंतर। तुम अपनी ज़ाहिलियत में बीमारी लेकर बैठे रहे और अपनाें को भी बीमार करते रहे। वे बीमार होकर भी इलाज करवाते रहे। ठीक होते रहे।

यही अंतर है दोनों में। इसके बावजूद कि ज़ाहिल इधर भी कम नहीं जिन्हें सोलापुर में कर्फ्यू के दौरान उन मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जन्मदिन का जुलूस निकालना था, जिन्हें रावण से युद्ध ही इसलिए लड़ना पड़ा कि उनके भाई द्वारा बनाई गई लक्ष्मण रेखा को उनकी पत्नी ने दान देने के लिए लांघ दिया था। लेकिन सोलापुर वालों की हरकत से तुम्हारे गुनाह कम नहीं होंगे, क्योंकि ये न सिर्फ संख्या में बड़ा है, बल्कि इसका दायरा पूरा देश है। जमात के इस मरकज़ का दामन अब कभी साफ नहीं हो पाएगा। दो दर्जन नंबर वाले मुफ्ती और मौलाना ने तुम्हें ज्ञान और विज्ञान को नकारने की जो घुट्‌टी पिलाई थी वही आज तुम्हारे लिए सबसे बड़ी परेशानी का कारण बन गई है। शुक्र करो, कौम के ज्यादातर लोग तुम्हारे खिलाफ खड़े हो गए, ताकि तुम ज़िंदा रह सको।

तानाशाहों को अपनी उम्र लंबी करने के लिए ज़रूरी होता है कि वे पूरी तरह से विज्ञान को नकार दें। उनके लिए यह समझाना बेहद जरूरी होता है कि जो भी कुछ हो रहा है, वह सिर्फ और सिर्फ ईश्वर, सिर्फ और सिर्फ अल्लाह तथा सिर्फ और सिर्फ ईसा के इशारे पर हो रहा है। विज्ञान को नकार देंगे तो आपका मानसिक विकास नहीं होगा और जब मानसिक विकास नहीं होगा तो आप मानसिक ग़ुलामी में जिंदा रहेंगे। मानसिक ग़ुलाम रहेंगे।

मोहम्मद अली जिन्ना का बयान, उन पर की गई रिसर्च और किताब के अंश और भाजपा के शीर्ष नेता रहे लालकृष्ण आडवाणी की जीवनी “मेरा जीवन, मेरा देश’ का अध्ययन करें और उसके बाद उनके निजी जीवन पर ग़ौर करें तो जो एक बात सामने आती है कि वे दोनों नेता पूरी तरह से ग़ैर धार्मिक रहे। इन्हें धर्मनिरपेक्ष भी कह सकते हैं- यदि जिन्ना के भाषणों के अंश को देखें और आडवाणीजी के जीवन के निजी अंशों को लें। तो ये दो लोग जिन्होंने मुसलमानों और हिंदुओं को धर्म के नाम पर इकट्‌ठा किया, उनका असली चेहरा क्या था। यदि आप इनके असली चेहरे को देखेंगे तो इस तीसरे व्यक्ति की बात आपको आसानी से समझ आएगी। और इस तीसरे आदमी की बात है मानवता को बचाने की, इंसानियत को बचाने की। और यहां तो पूरी की पूरी सभ्यता ही दांव पर लग गई है। विज्ञान ने भी करीब-करीब हाथ टेक दिए हैं। परंतु विज्ञान चूंकि तथ्यों पर, ज्ञान पर, अनुभव पर और जीवन पर आधारित है, इसलिए इस मुश्किल दौर में भी जिंदगी की मुस्कुराहट का रास्ता खोज रहा है। मुझे मालूम है कि मैं तीसरा पक्ष हूं। मुसलमान मुझे हिंदू समझकर कोसेंगे, हिंदू मुझे मुसलमान का पैरोकार मानकर कोसेंगे। मगर मानवता, जब धीरे-धीरे सरककर मौत की तरफ बढ़ेगी और जब मरने से पहले उसकी आखिरी चीख निकलेगी तो मेरे पूर्वज चाहे वो राहुल सांकृत्यायन हों, चाहे राही मासूम रज़ा हों, चाहे अली सरदार ज़ाफरी हों, चाहे महाश्वेता देवी हों, चाहे अमृतलाल नागर हों, चाहे फैज़ अहमद फैज़ हों, चाहे भगत सिंह हों, चाहे पेरियार हों, चाहे आंबेडकर हों… तो उस समय जब मानवता को बचाने के लिए मेरी आखिरी चीख गूंजेगी तो उसमें इन सबकी आवाज़ और ताकत शरीक होगी। और जब उस आवाज़ की गूंज आपके कानों तक गूंजेगी तो आपको अहसास होगा कि एक सही समय पर, सही व्यक्ति सही बात कहकर मानवता को, इंसानियत को बचाने की अंतिम कोशिश कर रहा था। धार्मिक और गैरधार्मिक आवरण ओढ़े जब आप इन चीखों के बीच मानवता की आवाज़ सुन रहे होंगे, तब भी मेरा यह यकीन आखिरी सांस तक टिका रहेगा कि मैं सिर्फ मानवता से इस दुनिया को बचा लूंगा…।

admin